गणतंत्र दिवस पर मोहन भागवत का संदेश: संविधान और नागरिक कर्तव्यों से मजबूत होगा भारत
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Mohan Bhagwat
मोहन भागवत ने मौलिक कर्तव्यों के पालन पर दिया जोर.
संविधान को धर्म और नैतिकता की मार्गदर्शिका बताया.
तिरंगे और अशोक चक्र के महत्व को किया रेखांकित.
Delhi / बिहार के मुजफ्फरपुर में 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने नागरिक कर्तव्यों, संविधान और भारतीय संस्कृति की भूमिका पर गहन विचार रखे। मुजफ्फरपुर स्थित RSS कार्यालय ‘मधुकर निकेतन’ में ध्वजारोहण के बाद आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया का एक अग्रणी गणराज्य बनाने के लिए हर नागरिक का अपने संविधान में निहित मौलिक कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना बेहद जरूरी है।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि संविधान केवल अधिकारों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह धर्म, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी की भी मार्गदर्शिका है। उन्होंने कहा कि यदि नागरिक केवल अधिकारों की बात करें और कर्तव्यों की अनदेखी करें, तो गणतंत्र कमजोर हो जाता है। इसलिए संविधान का अध्ययन हर नागरिक के लिए आवश्यक है, ताकि वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग रह सके।
RSS प्रमुख ने जोर देकर कहा कि नियम और कानून का सम्मान किए बिना किसी भी गणराज्य की स्थिरता संभव नहीं है। उन्होंने भारतीय संस्कृति का उदाहरण देते हुए बताया कि यहां नियमों और मर्यादाओं को हमेशा समाज को जोड़ने और संतुलन बनाए रखने का माध्यम माना गया है। भारतीय परंपराएं केवल व्यवहारिक ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलने की शक्ति भी रखती हैं।
देश की आज़ादी के संघर्ष और पूर्वजों के बलिदानों को याद करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि यह हर नागरिक का दायित्व है कि वह गणराज्य की रक्षा करे और उसे मजबूत बनाए। उन्होंने यह भी कहा कि गणतंत्र सरकार से नहीं, बल्कि नागरिकों के व्यवहार से मजबूत होता है। यदि नागरिक अनुशासित, नैतिक और जिम्मेदार होंगे, तभी लोकतंत्र सशक्त बनेगा।
तिरंगे के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि केसरिया रंग त्याग और निरंतर गतिशीलता का प्रतीक है, सफेद रंग विचारों की पवित्रता और शांति को दर्शाता है, जबकि हरा रंग प्रगति और समृद्धि का संकेत देता है। तिरंगे के मध्य स्थित अशोक चक्र यह संदेश देता है कि हर प्रकार की प्रगति धर्म और नैतिकता के मार्गदर्शन में ही होनी चाहिए।
अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने नागरिकों से आह्वान किया कि वे संविधान की भावना को केवल शब्दों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे अपने आचरण में उतारें। तभी भारत सच्चे अर्थों में एक मजबूत, स्थिर और आदर्श गणराज्य बन सकेगा।